श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 80: अयोध्या से गङ्गा तट तक सुरम्य शिविर और कूप आदि से युक्त सुखद राजमार्ग का निर्माण  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  2.80.15-16 
आज्ञाप्याथ यथाज्ञप्ति युक्तास्तेऽधिकृता नरा:।
रमणीयेषु देशेषु बहुस्वादुफलेषु च॥ १५॥
यो निवेशस्त्वभिप्रेतो भरतस्य महात्मन:।
भूयस्तं शोभयामासुर्भूषाभिर्भूषणोपमम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
मार्ग बन जाने पर, जिन्हें स्थान-स्थान पर शिविर आदि बनाने का अधिकार दिया गया था, वे उस कार्य में तत्पर होकर, भरतजी की आज्ञा के अनुसार अपने सेवकों को काम करने की आज्ञा देकर, उन सुन्दर प्रदेशों में जहाँ स्वादिष्ट फलों की बहुतायत थी, शिविर बनवाते थे और भरतजी की इच्छानुसार, मार्ग के श्रृंगाररूप उस शिविर को नाना प्रकार के अलंकारों से सजाते थे॥15-16॥
 
After the road was built, those who were given the authority to build camps etc. at various places, being devoted to the work, ordered their servants to work as per Bharat's orders and built camps in those beautiful regions where there was abundance of tasty fruits. And as Bharat desired, they further decorated that camp, which was an ornament of the road, with various kinds of ornaments.॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)