vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
»
सर्ग 8: मन्थरा का पुनः राज्याभिषेक को कैकेयी के लिये अनिष्टकारी बताना, कुब्जा का पुनः श्रीराम राज्य को भरत के लिये भयजनक बताकर कैकेयी को भड़काना
»
श्लोक 18
श्लोक
2.8.18
यथा वै भरतो मान्यस्तथा भूयोऽपि राघव:।
कौसल्यातोऽतिरिक्तं च मम शुश्रूषते बहु॥ १८॥
अनुवाद
जैसे भरत मेरे लिए आदर के पात्र हैं, वैसे ही श्री राम भी, बल्कि उनसे भी अधिक आदर के पात्र हैं; क्योंकि वे कौसल्या से भी अधिक मेरी सेवा करते हैं॥ 18॥
'Just as Bharat is worthy of respect for me, so too is Sri Rama, in fact even more so than him; because he serves me more than even Kausalya.॥ 18॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×