श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 78: शत्रुज का रोष, उनका कुब्जा को घसीटना और भरतजी के कहने से उसे मूर्च्छित अवस्था में छोड़ देना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.78.20 
तैर्वाक्यै: परुषैर्दु:खै: कैकेयी भृशदु:खिता।
शत्रुघ्नभयसंत्रस्ता पुत्रं शरणमागता॥ २०॥
 
 
अनुवाद
शत्रुघ्न के वे कठोर वचन अत्यंत पीड़ादायक थे। उन्हें सुनकर कैकेयी अत्यंत दुःखी हुईं। शत्रुघ्न के भय से काँप उठीं और अपने पुत्र की शरण में आईं।
 
Those harsh words of Shatrughna were very painful. Hearing them, Kaikeyi felt very sad. She trembled in fear of Shatrughna and came to her son for shelter.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)