श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 78: शत्रुज का रोष, उनका कुब्जा को घसीटना और भरतजी के कहने से उसे मूर्च्छित अवस्था में छोड़ देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.78.18 
तेन भाण्डेन विस्तीर्णं श्रीमद् राजनिवेशनम्।
अशोभत तदा भूय: शारदं गगनं यथा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
इन आभूषणों से वह भव्य महल और भी सुन्दर लग रहा था, मानो नक्षत्रों से सजा हुआ शरद ऋतु का आकाश हो।
 
With these pieces of jewellery, that magnificent palace looked even more beautiful, like the autumn sky decorated with constellations.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)