श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 78: शत्रुज का रोष, उनका कुब्जा को घसीटना और भरतजी के कहने से उसे मूर्च्छित अवस्था में छोड़ देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.78.15 
सानुक्रोशां वदान्यां च धर्मज्ञां च यशस्विनीम्।
कौसल्यां शरणं याम: सा हि नोऽस्ति ध्रुवा गति:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
अतः हम परम दयालु, उदार, ज्ञानी और यशस्वी महारानी कौशल्या की शरण लें। इस समय वे ही हमारा निश्चित मार्ग हैं।॥15॥
 
‘Therefore let us seek refuge in the most kind, generous, knowledgeable and glorious Queen Kausalya. At this time she alone is our sure path.'॥ 15॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas