श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 77: भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान, पिता की चिता भूमि पर जाकर भरत और शत्रुघ्न का विलाप करना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.77.9 
स तु दृष्ट्वा रुदन् दीन: पपात धरणीतले।
उत्थाप्यमान: शक्रस्य यन्त्रध्वज इवोच्छ्रित:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
उस स्थान को देखते ही वह दयनीय भाव से रोता हुआ भूमि पर गिर पड़ा, जैसे इन्द्र का यंत्रवत् चढ़ा हुआ ध्वज ऊपर की ओर उठते समय फिसलकर गिर पड़ा हो॥9॥
 
As soon as he saw that place, he fell down on the ground crying in a pitiable mood, just as a mechanically mounted flag of Indra had slipped and fallen while being raised upwards.॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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