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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 77: भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान, पिता की चिता भूमि पर जाकर भरत और शत्रुघ्न का विलाप करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.77.7 
यस्या गतिरनाथाया: पुत्र: प्रव्राजितो वनम्।
तामम्बां तात कौसल्यां त्यक्त्वा त्वं क्व गतो नृप॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! हे मनुष्यों के स्वामी! आपने अनाथ देवी के एकमात्र आश्रित पुत्र को वन में भेज दिया और माता कौशल्या को छोड़कर आप कहाँ चले गए?'॥7॥
 
'Father! O Lord of men! You sent to the forest the orphaned goddess's only support son, and where did you go leaving behind mother Kausalya?'॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)