श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 77: भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान, पिता की चिता भूमि पर जाकर भरत और शत्रुघ्न का विलाप करना  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  2.77.5-6 
शब्दापिहितकण्ठश्च शोधनार्थमुपागत:।
चितामूले पितुर्वाक्यमिदमाह सुदु:खित:॥ ५॥
तात यस्मिन् निसृष्टोऽहं त्वया भ्रातरि राघवे।
तस्मिन् वनं प्रव्रजिते शून्ये त्यक्तोऽस्म्यहं त्वया॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उस समय रोते-रोते उसका गला रुँध गया। वह अपने पिता की चितास्थल पर अस्थियाँ लेने आया और अत्यन्त दुःखी होकर इस प्रकार बोला - 'बेटा! तुमने मुझे मेरे बड़े भाई श्री रघुनाथजी को सौंप दिया था, किन्तु जब वे वन में चले गए, तब तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया (इस समय मेरा कोई सहारा नहीं है)।॥ 5-6॥
 
At that time his throat was choked with weeping. He came to the place of his father's funeral pyre to collect the ashes and being very sad he said thus - 'Son! You had handed me over to my elder brother Shri Raghunathji, but when he went to the forest you left me alone (at this time I have no one to support me).॥ 5-6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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