श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 77: भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान, पिता की चिता भूमि पर जाकर भरत और शत्रुघ्न का विलाप करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.77.4 
तत: प्रभातसमये दिवसे च त्रयोदशे।
विललाप महाबाहुर्भरत: शोकमूर्च्छित:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् तेरहवें दिन प्रातःकाल महाबाहु भरत शोक से मूर्छित होकर विलाप करने लगे॥4॥
 
Thereafter, on the morning of the thirteenth day, the mighty-armed Bharat became unconscious with grief and started wailing. 4॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas