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श्लोक 2.77.18  |
हीनो भ्रात्रा च पित्रा च शून्यामिक्ष्वाकुपालिताम्।
अयोध्यां न प्रवेक्ष्यामि प्रवेक्ष्यामि तपोवनम्॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| ‘मैं अपने बड़े भाई और पिता से रहित होकर इक्ष्वाकुवंश के राजाओं द्वारा पाली गई इस उजाड़ अयोध्या में प्रवेश नहीं करूँगा; मैं तपस्यारूपी वन में चला जाऊँगा।’॥18॥ |
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| 'Being devoid of my elder brother and father, I will not enter this desolate Ayodhya, which was brought up by the kings of the Ikshvaku dynasty; I will go to the forest of penance.'॥ 18॥ |
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