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ramayan 2.77.18: ‘मैं अपने बड़े भाई और पिता से रहित होकर इक्ष्वाकुवंश के राजाओं द्वारा पाली गई इस उजाड़ अयोध्या में प्रवेश नहीं करूँगा; मैं तपस्यारूपी वन में चला जाऊँगा।’॥18॥   |   ramayan सर्ग 2.77: भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान, पिता की चिता भूमि पर जाकर भरत और शत्रुघ्न का विलाप करना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 77: भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान, पिता की चिता भूमि पर जाकर भरत और शत्रुघ्न का विलाप करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.77.18 
हीनो भ्रात्रा च पित्रा च शून्यामिक्ष्वाकुपालिताम्।
अयोध्यां न प्रवेक्ष्यामि प्रवेक्ष्यामि तपोवनम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
‘मैं अपने बड़े भाई और पिता से रहित होकर इक्ष्वाकुवंश के राजाओं द्वारा पाली गई इस उजाड़ अयोध्या में प्रवेश नहीं करूँगा; मैं तपस्यारूपी वन में चला जाऊँगा।’॥18॥
 
'Being devoid of my elder brother and father, I will not enter this desolate Ayodhya, which was brought up by the kings of the Ikshvaku dynasty; I will go to the forest of penance.'॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)