श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 77: भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान, पिता की चिता भूमि पर जाकर भरत और शत्रुघ्न का विलाप करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.77.17 
पितरि स्वर्गमापन्ने रामे चारण्यमाश्रिते।
किं मे जीवितसामर्थ्यं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी मर गए और श्री राम वन चले गए। अब मुझमें जीवित रहने की क्या शक्ति है? अब तो मैं अग्नि में ही प्रवेश करूँगा। 17॥
 
'Father passed away and Shri Ram went to the forest. What power do I have to survive now? Now I will enter the fire only. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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