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श्लोक 2.77.17  |
पितरि स्वर्गमापन्ने रामे चारण्यमाश्रिते।
किं मे जीवितसामर्थ्यं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| 'पिताजी मर गए और श्री राम वन चले गए। अब मुझमें जीवित रहने की क्या शक्ति है? अब तो मैं अग्नि में ही प्रवेश करूँगा। 17॥ |
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| 'Father passed away and Shri Ram went to the forest. What power do I have to survive now? Now I will enter the fire only. 17॥ |
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