श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 77: भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान, पिता की चिता भूमि पर जाकर भरत और शत्रुघ्न का विलाप करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.77.15 
ननु भोज्येषु पानेषु वस्त्रेष्वाभरणेषु च।
प्रवारयति सर्वान् नस्तन्न: कोऽद्य करिष्यति॥ १५॥
 
 
अनुवाद
आपने बहुत मात्रा में भोजन, पेय, वस्त्र और आभूषण एकत्रित किए और हमसे कहा कि जो कुछ हमें अच्छा लगे, ले लो। अब हमारे लिए ऐसी व्यवस्था कौन करेगा?॥15॥
 
‘You collected food, drinks, clothes and ornaments in large quantities and asked us to take whatever we liked. Now who will make such arrangements for us?॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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