श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 77: भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान, पिता की चिता भूमि पर जाकर भरत और शत्रुघ्न का विलाप करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.77.14 
सुकुमारं च बालं च सततं लालितं त्वया।
क्व तात भरतं हित्वा विलपन्तं गतो भवान्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! आप उस कोमल और सुकुमार बालक भरत को, जो रोता-बिलखता रहता है, छोड़कर कहाँ चले गए?॥14॥
 
'Father, where have you gone, leaving behind Bharat, who is so tender and tender and who is a child, who is weeping and crying?॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)