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ramayan 2.77.13: हाय! जो मन्थरा से उत्पन्न हुआ है, जो कैकेयी रूपी मगरमच्छ द्वारा फैलाया गया है और जिसका किसी भी प्रकार से नाश नहीं हो सकता, उस मंगलमय शोकरूपी प्रचण्ड समुद्र ने हम सबको अपने भीतर डुबा लिया है।   |   ramayan सर्ग 2.77: भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान, पिता की चिता भूमि पर जाकर भरत और शत्रुघ्न का विलाप करना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 77: भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान, पिता की चिता भूमि पर जाकर भरत और शत्रुघ्न का विलाप करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.77.13 
मन्थराप्रभवस्तीव्र कैकेयीग्राहसंकुल:।
वरदानमयोऽक्षोभ्योऽमज्जयच्छोकसागर:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हाय! जो मन्थरा से उत्पन्न हुआ है, जो कैकेयी रूपी मगरमच्छ द्वारा फैलाया गया है और जिसका किसी भी प्रकार से नाश नहीं हो सकता, उस मंगलमय शोकरूपी प्रचण्ड समुद्र ने हम सबको अपने भीतर डुबा लिया है।
 
Alas! That which has been born from Manthara, that which is spread by the crocodile in the form of Kaikeyi and which cannot be wiped out by any means, that raging sea of ​​benediction-filled grief has submerged us all within itself.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)