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सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना
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श्लोक 64
श्लोक
2.75.64
एवं विलपमानस्य दु:खार्तस्य महात्मन:।
मोहाच्च शोकसंरम्भाद् बभूव लुलितं मन:॥ ६४॥
अनुवाद
महात्मा भरत भी शोक से कराह रहे थे। उनका मन मोह और शोक के बल से व्याकुल था।
Mahatma Bharat was also crying in grief. His mind was agitated by the force of attachment and grief. 64.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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