श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.75.56 
पानीयदूषके पापं तथैव विषदायके।
यत्तदेक: स लभतां यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
जो पाप जल को प्रदूषित करने वाले और दूसरों को विष देने वाले करते हैं, वे पाप उसी को भोगने चाहिए, जिसकी आज्ञा से आर्य श्री राम वन जाने को विवश हुए थे॥ 56॥
 
'The sins that are committed by those who pollute water and poison others, should be incurred by the one alone, with whose permission the Arya Sri Ram was compelled to go to the forest.॥ 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)