श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  2.75.44-45 
उभे संध्ये शयानस्य यत् पापं परिकल्प्यते।
तच्च पापं भवेत् तस्य यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ४४॥
यदग्निदायके पापं यत् पापं गुरुतल्पगे।
मित्रद्रोहे च यत् पापं तत् पापं प्रतिपद्यताम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
जिसके कहने पर भाई श्री राम को वन में भेजा गया, उसे वही पाप लगे जो संध्यावंदन के समय सोने वाले को लगते हैं। अग्नि जलाने वाला जो पाप करता है, गुरुपत्नी के साथ द्रोह करने वाला जो पाप करता है तथा मित्र के साथ द्रोह करने वाला जो पाप करता है, उसे भी वही पाप लगे।॥ 44-45॥
 
‘The one on whose advice brother Shri Ram was sent to the forest, may he incur the same sins that a person sleeping during the evening prayers commits. The sins that a person lighting a fire commits, the sins that a person who betrays his Guru's wife commits and the sins that a person commits by betraying a friend, may he also incur the same sins.॥ 44-45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)