श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.75.13 
क्षिप्रं मामपि कैकेयी प्रस्थापयितुमर्हति।
हिरण्यनाभो यत्रास्ते सुतो मे सुमहायशा:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
‘अब कैकेयी मुझे शीघ्र ही उसी स्थान पर भेज दे, जहाँ इस समय सुवर्णमय नाभि से सुशोभित मेरे यशस्वी पुत्र श्री रामजी हैं।॥13॥
 
‘Now Kaikeyi should quickly send me to the same place where my illustrious son, Shri Ram, adorned with a golden navel, is at this moment.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)