श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.75.12 
प्रस्थाप्य चीरवसनं पुत्रं मे वनवासिनम्।
कैकेयी कं गुणं तत्र पश्यति क्रूरदर्शिनी॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'मैं सोचता हूँ कि क्रूर कैकेयी ने इसमें क्या लाभ देखा कि मेरे पुत्र को चिथड़े पहनाकर वन में भेज दिया और उसे वनवासी बना दिया॥12॥
 
'I wonder what benefit the cruel Kaikeyi saw in this that she dressed my son in rags and sent him to the forest and made him a forest dweller.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)