श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 74: भरत का कैकेयी को कड़ी फटकार देना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.74.24 
मम कायात् प्रसूतौ हि दु:खितौ भारपीडितौ।
यौ दृष्ट्वा परितप्येऽहं नास्ति पुत्रसम: प्रिय:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
वे मेरे ही शरीर से उत्पन्न हुए हैं। वे बोझिल और दुःखी हैं, इसलिए मैं उन्हें देखकर दुःखी हो जाता हूँ; क्योंकि पुत्र के समान कोई प्रिय नहीं है॥24॥
 
‘They were born from my body. They are both burdened and sad, that is why I am filled with grief on seeing them; because there is no one as dear as a son.’॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)