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ramayan 2.72.47: महात्मा भरत के उपर्युक्त प्रकार पूछने पर कैकेयी, जो अनावश्यक रूप से अपने को महान विदुषी समझती थीं, बड़े हर्ष से बोलीं-॥47॥   |   ramayan सर्ग 2.72: भरत का कैकेयी से पिता के परलोकवास का समाचार पा दुःखी हो विलाप करना,कैकेयी द्वारा उनका श्रीराम के वनगमन के वृत्तान्त से अवगत होना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 72: भरत का कैकेयी से पिता के परलोकवास का समाचार पा दुःखी हो विलाप करना,कैकेयी द्वारा उनका श्रीराम के वनगमन के वृत्तान्त से अवगत होना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.72.47 
एवमुक्ता तु कैकेयी भरतेन महात्मना।
उवाच वचनं हृष्टा वृथापण्डितमानिनी॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
महात्मा भरत के उपर्युक्त प्रकार पूछने पर कैकेयी, जो अनावश्यक रूप से अपने को महान विदुषी समझती थीं, बड़े हर्ष से बोलीं-॥47॥
 
On being asked by Mahatma Bharat in the above manner, Kaikeyi, who unnecessarily considered herself a great scholar, said with great joy -॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)