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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 69: भरत की चिन्ता, मित्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास तथा उनके पूछने पर भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.69.15 
त्वरमाणश्च धर्मात्मा रक्तमाल्यानुलेपन:।
रथेन खरयुक्तेन प्रयातो दक्षिणामुख:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'पुण्यवान राजा दशरथ लाल पुष्पों की माला पहने तथा लाल चंदन लगाकर गधे द्वारा खींचे जाने वाले रथ पर बैठकर बहुत तेजी से दक्षिण दिशा की ओर चले हैं।
 
'The virtuous King Dasaratha, wearing a garland of red flowers and smeared with red sandalwood, sitting on a chariot drawn by a donkey, has moved very rapidly towards the south.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)