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ramayan 2.69.13: ‘मैंने यह भी देखा कि पृथ्वी फट गई है, नाना प्रकार के वृक्ष सूख गए हैं, पर्वत टूट गए हैं और उनसे धुआँ निकल रहा है।॥13॥   |   ramayan सर्ग 2.69: भरत की चिन्ता, मित्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास तथा उनके पूछने पर भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 69: भरत की चिन्ता, मित्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास तथा उनके पूछने पर भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.69.13 
अवदीर्णां च पृथिवीं शुष्कांश्च विविधान् द्रुमान्।
अहं पश्यामि विध्वस्तान् सधूमांश्चैव पर्वतान्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
‘मैंने यह भी देखा कि पृथ्वी फट गई है, नाना प्रकार के वृक्ष सूख गए हैं, पर्वत टूट गए हैं और उनसे धुआँ निकल रहा है।॥13॥
 
‘I also saw that the earth had split, various kinds of trees had dried up, the mountains had collapsed and smoke was coming out of them.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)