श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 67: मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मन्त्रियों का राजा के बिना होने वाली देश की दुरवस्था का वर्णन करके वसिष्ठजी से किसी को राजा बनाने के लिये अनुरोध  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  2.67.3-4 
मार्कण्डेयोऽथ मौद्‍गल्यो वामदेवश्च कश्यप:।
कात्यायनो गौतमश्च जाबालिश्च महायशा:॥ ३॥
एते द्विजा: सहामात्यै: पृथग्वाचमुदीरयन्।
वसिष्ठमेवाभिमुखा: श्रेष्ठं राजपुरोहितम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, कश्यप, कात्यायन, गौतम और महाबली, ये सभी ब्राह्मण श्रेष्ठ राजपुरोहित वसिष्ठ के सामने बैठकर मंत्रियों सहित अपनी-अपनी भिन्न-भिन्न राय देने लगे।
 
Markandeya, Maudgalya, Vamdev, Kashyap, Katyayan, Gautam and the great Jabali, all these Brahmins sat in front of the best royal priest Vasishtha and started giving their different opinions along with the ministers. 3-4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)