श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 65: वन्दीजनों का स्तुतिपाठ, राजा दशरथ को दिवंगत हुआ जान उनकी रानियों का करुण-विलाप  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.65.5 
तेन शब्देन विहगा: प्रतिबुद्धाश्च सस्वनु:।
शाखास्था: पञ्जरस्थाश्च ये राजकुलगोचरा:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उस ध्वनि से वृक्षों की शाखाओं पर बैठे पक्षी तथा राजपरिवार में विचरण करने वाले पिंजरों में बंद तोते व अन्य पक्षी जाग उठे और चहचहाने लगे।
 
At that sound, the birds sitting on the branches of the trees and the parrots and other birds confined in cages roaming in the royal family woke up and started chirping. 5.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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