श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 65: वन्दीजनों का स्तुतिपाठ, राजा दशरथ को दिवंगत हुआ जान उनकी रानियों का करुण-विलाप  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.65.20 
तत: प्रचुक्रुशुर्दीना: सस्वरं ता वराङ्गना:।
करेणेव इवारण्ये स्थानप्रच्युतयूथपा:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
फिर जैसे जंगल में हथिनियाँ अपने पति हाथी के चले जाने पर दुःख से विलाप करने लगती हैं, वैसे ही भीतरी महल की सुन्दर रानियाँ भी बहुत दुःखी होकर जोर-जोर से विलाप करने लगीं।
 
Then, just as female elephants in the jungle start wailing in pain when their husband, the elephant, goes away from his abode, similarly, the beautiful queens of the inner palace became very sad and started wailing loudly.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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