श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 65: वन्दीजनों का स्तुतिपाठ, राजा दशरथ को दिवंगत हुआ जान उनकी रानियों का करुण-विलाप  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.65.17 
निष्प्रभासा विवर्णा च सन्ना शोकेन संनता।
न व्यराजत कौसल्या तारेव तिमिरावृता॥ १७॥
 
 
अनुवाद
सोई हुई कौसल्या सौन्दर्यहीन हो गई थी। उसके शरीर का रंग बदल गया था। वह पराजित और शोक से पीड़ित होकर अंधकार में ढके हुए तारे के समान भी सुन्दर नहीं लग रही थी॥17॥
 
The sleeping Kausalya had become bereft of beauty. The colour of her body had changed. Defeated and afflicted by grief, she did not look as beautiful as a star covered in darkness.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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