श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  2.64.73 
चित्तनाशाद् विपद्यन्ते सर्वाण्येवेन्द्रियाणि हि।
क्षीणस्नेहस्य दीपस्य संरक्ता रश्मयो यथा॥ ७३॥
 
 
अनुवाद
जैसे तेल समाप्त हो जाने पर दीपक की स्वर्णिम आभा लुप्त हो जाती है, वैसे ही चेतना के नष्ट हो जाने से मेरी समस्त इन्द्रियाँ नष्ट हो गई हैं ॥ 73॥
 
Just as the golden glow of a lamp vanishes when the oil in it is finished, similarly, due to the loss of consciousness, all my senses have been destroyed. ॥ 73॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)