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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना
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श्लोक 66-67h
श्लोक
2.64.66-67h
अतस्तु किं दु:खतरं यदहं जीवितक्षये॥ ६६॥
नहि पश्यामि धर्मज्ञं रामं सत्यपराक्रमम्।
अनुवाद
'मेरे लिए इससे अधिक दुःख की बात क्या हो सकती है कि मैं मृत्यु के समय सत्यवादी, पराक्रमी और ज्ञानी राम को न देख सकूँ?'
'What could be more painful for me than not being able to see the truthful, valiant and knowledgeable Rama at the time of my death?'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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