श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 65-66h
 
 
श्लोक  2.64.65-66h 
चक्षुषा त्वां न पश्यामि स्मृतिर्मम विलुप्यते॥ ६५॥
दूता वैवस्वतस्यैते कौसल्ये त्वरयन्ति माम्।
 
 
अनुवाद
'कौशल्ये! अब मेरी आँखें तुम्हें देख नहीं पातीं, मेरी स्मृति भी क्षीण होती जा रही है। देखो, ये यमराज के दूत मुझे यहाँ से ले जाने के लिए आतुर हैं।'
 
‘Kausalye! Now my eyes cannot see you, my memory is also fading away. Look there, these messengers of Yamraj are eager to take me away from here. 65 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)