श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 59-60h
 
 
श्लोक  2.64.59-60h 
तस्यायं कर्मणो देवि विपाक: समुपस्थित:।
अपथ्यै: सह सम्भुक्ते व्याधिरन्नरसे यथा॥ ५९॥
तस्मान्मामागतं भद्रे तस्योदारस्य तद् वच:।
 
 
अनुवाद
‘देवी! जैसे अस्वास्थ्यकर पदार्थों के साथ भोजन करने से शरीर में रोग उत्पन्न हो जाता है, वैसे ही यह उस पापकर्म का फल है। अतः हे कल्याणी! उस उदार महात्मा के वचन रूपी शाप का फल इस समय मुझ पर फलित होने के लिए आया है।’॥59 1/2॥
 
‘Goddess! Just as a disease develops in the body after consuming food along with unwholesome things, similarly this is the result of that sinful act. Therefore, O Kalyani! The curse in the form of words of that generous Mahatma has come to me at this time to bear fruit.’॥ 59 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)