श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  2.64.57 
एवं शापं मयि न्यस्य विलप्य करुणं बहु।
चितामारोप्य देहं तन्मिथुनं स्वर्गमभ्ययात्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मुझे शाप देकर वे बहुत देर तक विलाप करते रहे; फिर दोनों पति-पत्नी ने अपने शरीरों को जलती हुई चिता में डाल दिया और स्वर्ग को चले गये।
 
‘Having cursed me in this manner, they wept pitifully for a long time; then both husband and wife cast their bodies into the burning pyre and departed for heaven.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)