श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 55-56
 
 
श्लोक  2.64.55-56 
अज्ञानात्तु हतो यस्मात् क्षत्रियेण त्वया मुनि:।
तस्मात् त्वां नाविशत्याशु ब्रह्महत्या नराधिप॥ ५५॥
त्वामप्येतादृशो भाव: क्षिप्रमेव गमिष्यति।
जीवितान्तकरो घोरो दातारमिव दक्षिणाम्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
"नरेश्वर! क्षत्रिय होकर भी तुमने अनजाने में वैश्य जाति के साधु की हत्या की है, इसलिए तुम्हें शीघ्र ही ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगेगा, तथापि शीघ्र ही उसी प्रकार की भयंकर तथा प्राण हरने वाली गति को प्राप्त हो जाओगे। जैसे दक्षिणा देने वाले दानी को वैसा ही फल मिलता है॥ 55-56॥
 
"Nareshwar! Being a Kshatriya you have unknowingly killed a Vaishya caste monk, therefore you will not soon be guilty of the sin of killing a brahmin, however you will soon attain a similar dreadful and life taking condition. Just like the donor who gives dakshina gets the corresponding reward.॥ 55-56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)