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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना
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श्लोक 47
श्लोक
2.64.47
स तु दिव्येन रूपेण मुनिपुत्र: स्वकर्मभि:।
स्वर्गमध्यारुहत् क्षिप्रं शक्रेण सह धर्मवित्॥ ४७॥
अनुवाद
'उसी समय वह पुण्यात्मा मुनि अपने पुण्यकर्मों के कारण दिव्य रूप धारण करके शीघ्र ही इन्द्र के साथ स्वर्गलोक को जाने लगा ॥47॥
'At the same time, that virtuous monk, assuming the divine form due to his virtuous deeds, soon started going to heaven with Indra. 47॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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