श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.64.45 
नहि त्वस्मिन् कुले जातो गच्छत्यकुशलां गतिम्।
स तु यास्यति येन त्वं निहतो मम बान्धव:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
हमारे समान तपस्वियों के कुल में उत्पन्न कोई भी मनुष्य बुरी गति को प्राप्त नहीं होता। हे मेरे भाई, जिसने तुम्हें अकारण मारा है, वह बुरी गति को प्राप्त होगा।॥45॥
 
‘‘No man born in a family of ascetics like us can attain a bad fate. The one who has killed you, my brother, without any reason, will meet a bad fate.’’॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)