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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना
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श्लोक 35
श्लोक
2.64.35
इमामन्धां च वृद्धां च मातरं ते तपस्विनीम्।
कथं पुत्र भरिष्यामि कृपणां पुत्रगर्धिनीम्॥ ३५॥
अनुवाद
"बेटा! तुम्हारी तपस्विनी माता अंधी, वृद्धा, दुखी है और पुत्र की कामना करती है। मैं (स्वयं अंधा होने के कारण) उसका भरण-पोषण कैसे करुंगा?"
"Son! Your ascetic mother is blind, old, miserable and yearns for a son. How will I (being blind myself) support her?"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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