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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना
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श्लोक 34
श्लोक
2.64.34
कन्दमूलफलं हृत्वा यो मां प्रियमिवातिथिम्।
भोजयिष्यत्यकर्मण्यमप्रग्रहमनायकम्॥ ३४॥
अनुवाद
"अब ऐसा कौन है जो कंद, मूल और फल लाकर मुझ आलसी, अन्नहीन और अनाथ को प्रिय अतिथि के समान भोजन कराएगा? ॥ 34॥
"Who is there now who will bring tubers, roots and fruits and feed me, an idle person, devoid of food and an orphan, like a dear guest? ॥ 34॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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