श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.64.24 
सप्तधा तु भवेन्मूर्धा मुनौ तपसि तिष्ठति।
ज्ञानाद् विसृजत: शस्त्रं तादृशे ब्रह्मवादिनि॥ २४॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर तपस्या में लीन ऋषि पर शस्त्र से प्रहार करता है, तो उसका सिर सात टुकड़ों में टूट जाता है।
 
"If a person deliberately attacks a sage engaged in austerity with a weapon, his head gets broken into seven pieces." 24.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)