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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 63: राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनि कुमार के मारे जाने का प्रसङ्ग सुनाना  »  श्लोक 46-48h
 
 
श्लोक  2.63.46-48h 
सशल्य: क्लिश्यते प्राणैर्विशल्यो विनशिष्यति॥ ४६॥
इति मामविशच्चिन्ता तस्य शल्यापकर्षणे।
दु:खितस्य च दीनस्य मम शोकातुरस्य च॥ ४७॥
लक्षयामास स ऋषिश्चिन्तां मुनिसुतस्तदा।
 
 
अनुवाद
ऋषिपुत्र की यह बात सुनकर मुझे चिंता हुई कि यदि मैं बाण न निकालूँ तो इन्हें पीड़ा होगी और यदि निकाल दूँ तो इनके प्राण चले जाएँगे। इस प्रकार ऋषिपुत्र ने बाण निकालने के विषय में दुःखी और शोकाकुल दशरथ की चिंता पर ध्यान दिया।
 
On hearing this from the son of the sage, I became worried that if I do not remove the arrow, he will be in pain and if I remove it, he will lose his life. In this way, the son of the sage took note of the worry of Dasharatha, who was sad and grief-stricken, regarding removing the arrow.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)