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श्लोक  2.63.21 
निपाने महिषं रात्रौ गजं वाभ्यागतं मृगम्।
अन्यद् वा श्वापदं किंचिज्जिघांसुरजितेन्द्रिय:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'मेरी इंद्रियाँ मेरे वश में नहीं थीं। मैंने सोचा था कि जब कोई उत्पाती भैंसा, कोई मतवाला हाथी या शेर, बाघ या कोई और हिंसक जानवर रात में पानी पीने घाट पर आएगा, तो मैं उसे मार डालूँगा।
 
‘My senses were not under my control. I had thought that when a mischievous buffalo, a drunken elephant or a lion, tiger or any other ferocious animal would come to the ghat to drink water at night, I would kill it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)