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श्लोक 2.60.3  |
निवर्तय रथं शीघ्रं दण्डकान् नय मामपि।
अथ तान् नानुगच्छामि गमिष्यामि यमक्षयम्॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| 'शीघ्र रथ लौटा दो और मुझे भी दण्डकारण्य ले चलो। यदि मैं वहाँ न जा सकूँ, तो यमलोक की यात्रा करूँगा।'॥3॥ |
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| 'Return the chariot quickly and take me also to Dandakaranya. If I am not able to go there, then I will travel to Yamaloka.'॥ 3॥ |
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