श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 60: कौसल्या का विलाप और सारथि सुमन्त्र का उन्हें समझाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.60.15 
ध्वंसयित्वा तु तद् वाक्यं प्रमादात् पर्युपस्थितम्।
ह्लादनं वचनं सूतो देव्या मधुरमब्रवीत्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार कैकेयी के विषय में भूल से निकले हुए वचनों को पलटकर सारथि सुमन्त्र ने देवी कौसल्या के हृदय को आनन्द पहुँचाने वाले मधुर वचन कहे- ॥15॥
 
In this way, turning around the words about Kaikeyi that had come out by mistake, the charioteer Sumantra said sweet words that brought joy to the heart of Goddess Kausalya – ॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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