श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 59: सुमन्त्र द्वारा श्रीराम के शोक से जडचेतन एवं अयोध्यापुरी की दुरवस्था का वर्णन तथा राजा दशरथ का विलाप  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.59.27 
हा राम रामानुज हा हा वैदेहि तपस्विनि।
न मां जानीत दु:खेन म्रियमाणमनाथवत्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हे राम! हे लक्ष्मण! हे विदेह राजकुमारी, तपस्वी सीता! तुम्हें पता नहीं होगा कि मैं अनाथ की तरह कितनी दुःखद मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूँ। ॥27॥
 
"Oh Rama! Oh Lakshmana! Oh Videha princess, ascetic Sita! You must not know how miserably I am dying like an orphan." ॥27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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