श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 59: सुमन्त्र द्वारा श्रीराम के शोक से जडचेतन एवं अयोध्यापुरी की दुरवस्था का वर्णन तथा राजा दशरथ का विलाप  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  2.59.15-16 
अप्रहृष्टमनुष्या च दीननागतुरंगमा।
आर्तस्वरपरिम्लाना विनि:श्वसितनि:स्वना॥ १५॥
निरानन्दा महाराज रामप्रव्राजनातुरा।
कौसल्या पुत्रहीनेव अयोध्या प्रतिभाति मे॥ १६॥
 
 
अनुवाद
महाराज! अयोध्यावासियों का सुख नष्ट हो गया है। वहाँ के घोड़े और हाथी भी अत्यन्त दुःखी हैं। सारा नगर वेदना के आर्तनाद से मलिन प्रतीत हो रहा है। प्रजा के गहरे आहें इस नगर के आहें बन गए हैं। यह अयोध्या मुझे पुत्रहीन, श्री राम के वनवास से व्याकुल, पुत्रहीन कन्या कौशल्या के समान हर्षहीन प्रतीत हो रही है॥15-16॥
 
‘Maharaj! The people of Ayodhya have lost their happiness. The horses and elephants there are also very sad. The whole city looks dirty with the cries of pain. The deep sighs of the people have become the sighs of this city. This Ayodhya appears to me to be devoid of joy like Kausalya, the daughter of a lost son, who was distraught by Shri Ram's exile.'॥ 15-16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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