श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 59: सुमन्त्र द्वारा श्रीराम के शोक से जडचेतन एवं अयोध्यापुरी की दुरवस्था का वर्णन तथा राजा दशरथ का विलाप  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.59.10 
प्रविशन्तमयोध्यायां न कश्चिदभिनन्दति।
नरा राममपश्यन्तो नि:श्वसन्ति मुहुर्मुहु:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
‘जब मैं अयोध्या में प्रवेश कर रहा था, तब कोई भी मुझसे प्रसन्नतापूर्वक बात नहीं कर रहा था। श्री राम को न देखकर लोग बार-बार गहरी साँसें लेने लगे।॥10॥
 
‘When I was entering Ayodhya, no one spoke to me happily. On not seeing Shri Ram, people started taking deep breaths again and again.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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