श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 58: महाराज दशरथ की आज्ञा से सुमन्त्र का श्रीराम और लक्ष्मण के संदेश सुनाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.58.31 
अहं तावन्महाराजे पितृत्वं नोपलक्षये।
भ्राता भर्ता च बन्धुश्च पिता च मम राघव:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'इस समय मैं महाराज में पिता-भाव नहीं देख रहा हूँ। अब तो रघुकुलनन्दन श्री राम ही मेरे भाई, स्वामी, सम्बन्धी और पिता हैं।' 31॥
 
'At this moment I do not see a fatherly feeling in Maharaj. Now Raghukulnandan Shri Ram is my brother, master, relative and father. 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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