| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 58: महाराज दशरथ की आज्ञा से सुमन्त्र का श्रीराम और लक्ष्मण के संदेश सुनाना » श्लोक 24-25 |
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| | | | श्लोक 2.58.24-25  | अब्रवीच्चापि मां भूयो भृशमश्रूणि वर्तयन्।
मातेव मम माता ते द्रष्टव्या पुत्रगर्धिनी॥ २४॥
इत्येवं मां महाबाहुर्ब्रुवन्नेव महायशा:।
रामो राजीवपत्राक्षो भृशमश्रूण्यवर्तयत्॥ २५॥ | | | | | | अनुवाद | | फिर उन्होंने नेत्रों से बहुत-से आँसू बहाकर मुझे भरत को यह संदेश दिया - 'भरत! मेरी माता को अपनी माता के समान समझो।' मुझसे इतना कहकर महाबाहु, परम तेजस्वी, कमल-नेत्र वाले श्री रामजी बड़े वेग से आँसू बहाने लगे। | | | | ‘Then, shedding many tears from his eyes, he gave me this message to convey to Bharata - ‘Bharata! Consider my mother who loves her like your own mother.’ Having said just this much to me, the mighty-armed, highly illustrious, lotus-eyed Shri Ram started shedding tears with great force. | | ✨ ai-generated | | |
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