श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 58: महाराज दशरथ की आज्ञा से सुमन्त्र का श्रीराम और लक्ष्मण के संदेश सुनाना  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  2.58.17-18 
माता च मम कौसल्या कुशलं चाभिवादनम्।
अप्रमादं च वक्तव्या ब्रूयाश्चैनामिदं वच:॥ १७॥
धर्मनित्या यथाकालमग्न्यगारपरा भव।
देवि देवस्य पादौ च देववत् परिपालय॥ १८॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद मेरी माता कौशल्या को मेरा प्रणाम कहना और उनसे कहना कि मैं कुशलपूर्वक हूँ और धर्मपालन में सावधान हूँ। फिर उनसे मेरा संदेश कहना कि, 'माता! तुम सदैव धर्म में तत्पर रहो और नियत समय में अग्निहोत्र का अनुष्ठान करो। देवि! महाराज को देवता के समान मानो और उनके चरणों की सेवा करो।'
 
‘After this, convey my regards to my mother Kausalya and tell her that I am well and I am careful in following the Dharma.’ Then convey my message to her that ‘Mother! You should always remain devoted to Dharma and engage yourself in the Agnihotra rituals in the prescribed time. Goddess! Treat Maharaj like a deity and serve his feet.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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