श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 57: सुमन्त्र का अयोध्या को लौटना, उनके मुख से श्रीराम का संदेश सुनकर पुरवासियों का विलाप, राजा दशरथ और कौसल्या की मूर्छा तथा अन्तःपुर की रानियों का आर्तनाद  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.57.8 
इति चिन्तापर: सूतो वाजिभि: शीघ्रयायिभि:।
नगरद्वारमासाद्य त्वरित: प्रविवेश ह॥ ८॥
 
 
अनुवाद
इससे चिन्तित होकर सारथी सुमन्तराम अपने वेगशाली घोड़ों पर सवार होकर नगर के द्वार पर पहुंचे और तुरन्त ही नगर में प्रवेश कर गए।
 
Worried about this, charioteer Sumantram reached the city gate on his swift horses and immediately entered the city.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)