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श्लोक 2.56.35  |
सुरम्यमासाद्य तु चित्रकूटं
नदीं च तां माल्यवतीं सुतीर्थाम्।
ननन्द हृष्टो मृगपक्षिजुष्टां
जहौ च दु:खं पुरविप्रवासात्॥ ३५॥ |
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| अनुवाद |
| चित्रकूट पर्वत अत्यंत सुंदर था। वहाँ उत्तम तीर्थों (तीर्थस्थानों, सीढ़ियों और घाटों) से सुशोभित माल्यवती (मंदाकिनी) नदी बहती थी, जिसका उपयोग अनेक पशु-पक्षी करते थे। उस पर्वत और नदी का सान्निध्य पाकर श्री रामचंद्र जी अत्यंत प्रसन्न और आनंदित हुए। नगर से दूर वन में आने से होने वाले दुःख को वे भूल गए। 35। |
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| Chitrakoot mountain was very beautiful. There flowed the river Malyavati (Mandakini) adorned with excellent pilgrimages (pilgrim places, stairs and ghats), which was used by many animals and birds. Shri Ramchandra ji felt very happy and joyful after getting the proximity of that mountain and river. He forgot the pain caused by coming to the forest far away from the city. 35. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्पञ्चाश: सर्ग:॥ ५६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५६॥ |
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